क्या सिनेमा सच में समाज का आईना होता है ? जी नहीं, सिनेमा केवल प्रोडक्शन हाउस, उसके डायरेक्टर, लेखक, पटकथा रचयिता की सोच को दर्शाता है और समाज को सिर्फ़ ग्राहक के रूप में अपना उत्पाद परोस दिया जाता है ।
सिनेमा को समाज का प्रतिबिंब समझना बंद करें , अच्छी फ़िल्मो को प्रोत्साहित करें एवं समाज को नग्नता और वैचारिक हीन भावना की ओर धकेलने वाली फ़िल्मो और उनके प्रायोजकों का बहिष्कार करें
You squeeze the demand and the supply will follow …
सिनेमा एक उत्पाद
बाज़ार केवल माँग पर ही नहीं चलता, आज के समय में यह देखा गया है की बाज़ार को किसी एक तरह के समान को बेचने की ओर धकेला जाता है
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