अक्तूबर में इज़राइल पर हुए हमास के हमले में १४०० से ज़्यादा लोग मारे गये जिसके पश्चात इज़राइल की सेना का ऑपरेशन गाजा पट्टी में निरंतर एक माह से चल रहा है, लेकिन इस प्रकरण से आम नागरिकों को बहुत कुछ सीखने को मिल सकता है :
प्रशिक्षण और उपकरण एक दूसरे के पूरक हैं , एक के बिना दूसरा प्रभावहीन हो जाता है। इज़राइल जैसे राष्ट्र में जहां ९० प्रतिशत से ज़्यादा की जनसंख्या अनिवार्य सैन्य सेवा (mandatory military service) का अनुभव रखती है, कठोर शस्त्र नियमों के चलते पूर्ण प्रशिक्षण के बाद भी हमले के समय निःशस्त्र थे ।
भारत जैसा विशाल राष्ट्र जिसमे ८००० से ज़्यादा बोलियाँ और १५० करोड़ नागरिक हों , जो एक तरफ़ चीन ( कम्युनिस्ट देश) और दूसरी तरफ़ पाकिस्तान (इस्लामिक देश ) जैसे चिर-विरोधियों से घिरा हो, जिसके पूर्व से दक्षिण तक अलगाववादी माओवादी प्रभाव रखते हों उसकी नागरिक शस्त्र नियमावली की कठोरता अप्रासंगिक ज्ञात होती है।
कुछ विचार
कई ऐसे बिंदु हैं जिनपर ध्यान देना ज़रूरी है :
- कैसे ८० के निकट छोटे वाहनों में द्रुत गति से हमास के आतंकवादी इज़राइल के ४० किलोमीटर अंदर तक घुस पाते हैं, और वहाँ का प्रशासन त्वरित प्रतिक्रिया नहीं कर पाता।
- क्यों प्रशिक्षित नागरिक निःशस्त्र रहे, और आतंकवादियों का सामना करने के बजाय नृशंसता से मार दिये गये।
- इज़राइल में किस प्रकार के नागरिक संगठन काम कर रहे हैं और किसी प्रकार की अनहोनी से निपटने में हमारे कौन कौन से नागरिक/ सामाजिक संगठन समर्थ हैं।
इन कुछ बिंदुओं के साथ यह लेख यहीं समाप्त करते हैं, अपने विचार ज़रूर साझा करें।